11 अक्टूबर को शारदीय नवरात्रि का शुभ शंखनाद हमारी संस्कृति, आस्था और दैवीय भक्ति के उत्सव का आरंभ करेगा। नौ दिनों का यह पर्व हिंदू परंपरा की वह श्रृंखला है जिसमें देवी माँ दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों को बहुत भक्तिभाव से पूजा जाता है। इस एक पर्व में कलश स्थापना, देवी पूजा, अखंड ज्योति, मंत्र जाप, व्रत, कन्या पूजन और हवन जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। कहते हैं जो सच्ची श्रद्धा से इन नौ दिनों माँ के नौ स्वरूपों - शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री को पूजता है, माँ उसकी हर मनोकामना पूरी करती हैं। माँ दुर्गा को शक्ति और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना गया है। इन नौ दिनों की उपासना में भक्त माँ भगवती से शक्ति, साहस, सुख-शांति, ज्ञान और जीवन में सकारात्मकता की कामना करते हैं।
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प्रमुख अनुष्ठान
कलश स्थापना
नवरात्रि के नवारंभ पर पवित्र कलश स्थापना की जाती है। समूचे घर की साफ सफाई और सजावट करके चौकी पर कलश स्थापित किया जाता हैं। स्थानीय परंपरा और सहूलियत अनुसार उसमें पवित्र जल, आम के पत्ते, नारियल आदि स्थापित करते हैं। यह कलश प्रकृति की कोख और सृजन का प्रतीक है। इसके पास ही जौ भी बोए जाते हैं। जौ को सृष्टि की पहली फसल और भगवान ब्रह्मा का स्वरूप माना गया है। जौ जितने घने, हरे, और सीधे उगते हैं उसे उतना ही जीवन में आने वाले शुभ संकेत की तहर देखते हैं। यह माँ अन्नपुर्णा और प्रकृति की शक्ति को दर्शाता है। पंचांग के अनुसार इस साल माता का आगमन हाथी पर होगा जो अच्छी वर्षा, धन-धान्य में उन्नति, सुख-शांति और स्थिरता का संदेश देती हैं। माता के आगमन पर घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 06:19 बजे से 10:12 बजे तक है।
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अखंड ज्योति
अखंड ज्योति का अर्थ ऐसे दीपक से है जो नवरात्रि के नौ दिनों तक बिना बुझे लगातार जलता रहे। यह माँ की उपस्थिति को दर्शाता है और इससे घर में दैवीय ऊर्जा का संचार होता है। घी का दीया हमेशा देवी दुर्गा के दायीं ओर और तेल (तिल या सरसों) का दीया बाईं ओर सीधे जमीन पर न रखकर इसे लकड़ी की चौकी पर चावल या गेहूं का आसन बनाकर उसके ऊपर रखना चाहिए। यदि अखंड ज्योति घर में रखते हैं तो घर को सूना नहीं छोड़ना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती और मंत्र जाप
नवरात्रि के पावन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ और मंत्र जाप करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। दुर्गा सप्तशती हिन्दू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली ग्रंथ है, जिसमें माँ दुर्गा की महिमा, उनके चरित्र और विभिन्न सिद्ध मंत्रों का वर्णन मिलता है। सर्वप्रथम पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठकर पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र किया जाता है फिर पाठ शुरू करने से पहले देवी कवच, अर्गल स्तोत्र और कीलक का पाठ किया जाता है। यह एकाग्रता और आध्यात्मिक साधना का एक माध्यम है।
नवरात्रि व्रत और सात्त्विक आहार
नवरात्रि के दौरान व्रत या सात्विक भोजन ग्रहण मन में शुद्धता, संयम और अनुशासित रहने का पारंपरिक के साथ वैज्ञानिक तरीका भी है। लोग अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार इसका पालन करते हैं। कुछ लोग पूरे दिन उपवास रखते हैं जबकि कुछ फलाहार या सात्विक भोजन लेते हैं। व्रत में सामान्य रूप से फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़े का आटा, राजगीरा और कुछ विशेष व्रत-अनुकूल अनाज का सेवन किया जाता है। कुछ परिवारों में सेंधा नमक का उपयोग भी करते हैं। इस व्रत का अर्थ खुद को अस्वस्थ करना नहीं बल्कि अपनी शारीरिक क्षमता को निखारना है।
दुर्गाष्टमी और महानवमी
नवरात्रि के पावन नौ दिनों में आठवें और नौवें दिन माँ भगवती की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। दुर्गाष्टमी पर माँ महागौरी स्वरूप की आराधना के साथ घरों में छोटी कन्याओं और एक छोटे बालक (भैरव रूप) को आमंत्रित कर पूजा जाता है जिसे कन्या पूजन या कंजक पूजा कहते हैं। यह माँ दुर्गा की नौ छवि को दर्शाता है। वहीं महानवमी माँ सिद्धिदात्री स्वरूप के लिए समर्पित है जिसमें नवमी हवन की परंपरा खूब प्रचलित है। हवन अग्नि के माध्यम से हम सभी देवी देवताओं को आहुति अर्पित करते हैं। इस पूर्णाहुति के साथ होता है नवरात्रि का समापन। कई स्थानीय परंपराओं में अष्टमी और नवमी के संधिकाल में संधि पूजा का भी चलन है।
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विजयादशमी: नवरात्रि का समापन और विजय का संदेश
नवरात्रि के शुभ समापन के साथ अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है, जिसे दशहरा भी कहते हैं। यह दिन नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध और भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय का उत्सव है। इस दिन लोग शस्त्र - उपकरण और शमी के पेड़ की पूजा करते हैं। विजयादशमी नवरात्रि की आध्यात्मिक यात्रा को पूर्ण करता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का एक जश्न है। हम देवी दुर्गा से बाहरी बुराई के साथ अपने अंदर के अहंकार और नकारात्मकता से लड़ने की शक्ति मांगते हैं।
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घर पर नवरात्रि की सरल पूजा विधि
कई लोग माँ दुर्गा की पूजा अर्चना करना तो चाहते हैं मगर बहुत सारी विधियों और नियमों के कारण इसे टाल देते हैं। ऐसे में बहुत सरल विधि से भी माँ दुर्गा को प्रसन्न किया जा सकता है। घर और पूजा स्थान की अच्छे से सफ़ाई करके माँ दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा के साथ शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित कर सकते हैं। दीप, फूल और भोग अर्पित कर अपनी सुविधा के अनुसार मंत्र जाप और देवी स्तुति के साथ आरती कर सकते हैं। नौ दिनों तक इसी नियम के साथ पूजा करने के बाद यथाशक्ति दान पुण्य और हवन का हिस्सा बन सकते हैं। भगवान की भक्ति में मन और आचरण का पवित्र होना सबसे ज़रूरी नियम है। अपनी आत्मिक संतुष्टि और श्रद्धा से किया गया सरल पूजन-अर्पण ही इस पर्व को सार्थक बनाता है।