11 अक्टूबर : शारदीय नवरात्रि आरंभ
नवरात्रि का शुभारंभ पवित्र कलश की स्थापना से किया जाता है। जिसमें पूजा स्थल पर एक कलश में जल, कुछ आम के पत्ते और नारियल रखा जाता है। इसके साथ जौ बोए जाते हैं, जो जीवन में समृद्धि और नव आरम्भ को दर्शाता है। कलश स्थापना के साथ भक्तजन मां दुर्गा का आवाहन और पूजा का संकल्प लेते हैं। इस पल से अगले नौ दिनों तक देवी के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। यह कलश प्रकृति की कोख और सृजन का प्रतीक है। इससे घर में दैवीय ऊर्जा का संचार होता है। माता के आगमन पर घटस्थापना का शुभ मुहूर्त है - सुबह 06:19 बजे से 10:12 बजे तक।
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18-19 अक्टूबर : दुर्गाष्टमी और महानवमी
नवरात्रि के पावन नौ दिनों में आठवें और नौवें दिन माँ भगवती की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। दुर्गाष्टमी पर माँ महागौरी स्वरूप की आराधना के साथ घरों में आमंत्रित कर कन्याओं को पूजा जाता है जिसे कन्या पूजन कहते हैं। यह माँ दुर्गा की नौ छवि को दर्शाता है। वहीं महानवमी माँ सिद्धिदात्री स्वरूप के लिए समर्पित है जिसमें नवमी हवन की परंपरा खूब प्रचलित है। फिर नौ दिनों की पवित्र साधना के बाद पूर्णाहुति के साथ होता है नवरात्रि का समापन। कई स्थानीय परंपराओं में अष्टमी और नवमी के संधिकाल में संधि पूजा का भी चलन है।
कन्या पूजन और हवन सामग्री सहित चढ़ावा चढ़ाएं →
20 अक्टूबर : विजयादशमी और दशहरा
नवरात्रि के शुभ समापन के साथ अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है, जिसे दशहरा भी कहते हैं। यह दिन भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय और नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध की स्मृति से जुड़ा है। इस दिन को असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग शस्त्र - उपकरण और शमी के पेड़ की पूजा करते हैं। कई जगह रामलीला का आयोजन होता है और लोग रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन करते हैं। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का एक जश्न है।
25 अक्टूबर : शरद पूर्णिमा
शरद पूर्णिमा हिंदू पंचांग की महत्वपूर्ण पूर्णिमा तिथियों में से एक है। यह पर्व माँ लक्ष्मी, भगवान विष्णु और चंद्र देव को समर्पित है। कहते हैं शरद पूर्णिमा की रात लक्ष्मी माता पृथ्वीलोक का भ्रमण करती है और रात्रि में जागकर उनका आवाहन करने वाले भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती हैं। यही वजह है कि इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा से अमृतमय किरणें धरती पर बरसती हैं जिसमें औषधीय गुण होते हैं इसीलिए घरों में लोग दूध और चावल की खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखते हैं और सुबह उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
शरद पूर्णिमा पर लक्ष्मी-नारायण पूजा बुक करें →
29 अक्टूबर : करवा चौथ
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी का संयोग करवा चौथ का त्यौहार लाता है। इस पर्व पर विवाहित महिलाएं अपने पति के लंबे, स्वस्थ जीवन और अखंड सौभाग्य के लिए सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। चंद्रमा के उदय पर छलनी से उसका दर्शन और अर्घ्य देकर अपने पति के हाथों से जल का पान करके व्रत खोलती हैं। मिट्टी के करवे को सजाकर, जल भर कर उसे पूजा में शामिल करती हैं और पवित्र मन से करवा चौथ कथा सुनती हैं। करवा चौथ दांपत्य जीवन में प्रेम का पर्व है।
करवा चौथ पर अपने पति के नाम से चढ़ावा चढ़ाएं →
नवंबर 2026
1 नवंबर : अहोई अष्टमी
अहोई अष्टमी का त्यौहार संतान के सुखी और स्वस्थ जीवन से जुड़ा है। इस दिन माताएँ उषाकाल से गोधूलि बेला तक उपवास करती हैं और शाम में अहोई माता की कथा सुनने के बाद तारों को अर्घ्य अर्पण कर अपना व्रत पूरा करती हैं। स्थानीय परंपराओं में अहोई माता के चित्र में सेही और उसके बच्चों का चित्र भी बनाया जाता है, जो इस व्रत की लोककथा से जुड़ा है।
6 नवंबर : धनतेरस
हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को समुद्र मंथन से आयुर्वेद के जनक, भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए यह दिन धनतेरस या धनत्रयोदशी कहलाता है। इस शुभ दिन लोग भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की उपासना करते हैं। धनतेरस में सोना, चाँदी, बर्तन और अन्य उपयोगी चीज़े खरीदने का चलन है। कहते हैं इससे जीवन में तेरह गुणा वृद्धि होती है। साथ ही धनतेरस की संध्या यमराज के नाम पर दक्षिण दिशा में यम दीप जलाने की प्रथा है जिससे अकाल निधन से रक्षा होती है।
धनतेरस पर धन्वंतरि और कुबेर चढ़ावा चढ़ाएं →
8 नवंबर : दीपावली और लक्ष्मी पूजा
दीपावली का दिन भगवान राम के घरवापसी का त्यौहार है। भगवान राम जब माता सीता और भाई लक्ष्मण संग चौदह वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या पधारे तो पूरी नगरी उनके स्वागत में दीप प्रज्ज्वलित करके उनका स्वागत करती है। इसी रात माता लक्ष्मी भी समुद्र मंथन से प्रकट हुई। दीप पर्व हमारे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का प्रकाश लाता है इसलिए इस दिन हर घर दीपों की रोशनी से जगमगा उठता है। पूरे घर की सफ़ाई और सजावट के बाद शाम को लक्ष्मी-गणेश पूजन किया जाता है। स्थानीय परंपराओं में कुबेर पूजन और दीप दान का भी महत्व है।
दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा अपने नाम से बुक करें →
10 नवंबर : गोवर्धन पूजा
गोवर्धन पूजा की कहानी द्वापर युग की है। जब श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र देव की जगह गोवर्धन पर्वत यानि प्रकृति की पूजा करने के लिए प्रेरित किया तो इंद्र देव ने ब्रजवासियों पर अपना क्रोध जताया। श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली से गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और सारे लोगों की जान बचाई जिससे इंद्र का अहंकार चूर हो गया। यह दिन श्री कृष्ण और प्रकृति को समर्पित है। इस दिन लोग गोबर से गोवर्धन का प्रतीक बनाकर पूजते हैं, अन्नकूट और 56 भोग लगाकर परिक्रमा करते हैं। प्रचलित परंपरा में गौ-सेवा का भी महत्व है जिसमें गायों को नहलाकर, श्रृंगार कर उनको गुड़ और चारा खिलाया जाता है।
गोवर्धन पूजा पर गौ-सेवा चढ़ावा चढ़ाएं →
11 नवंबर : भाई दूज
भाई - बहन के स्नेह का पर्व भाई दूज मनाने के पीछे यह कथा प्रचलित है कि इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना जी के घर गए। यमुना जी ने बड़े उल्लास से उनका स्वागत किया, तिलक लगाकर आरती उतारी और भोजन कराया। इसी परंपरा का उत्सव मनाते हुए बहनें अपने भाई के लम्बे, स्वस्थ जीवन और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। कहते हैं ऐसा करने से बहनें अपने भाई की अकाल निधन या यमराज के भय से रक्षा करती है। इसीलिए इसे ‘यम द्वितीया’ भी कहते हैं।
13-16 नवंबर : छठ पूजा
भारतीय संस्कृति में एक ऐसा पर्व है जिसमें सिर्फ़ उगते सूरज को ही नहीं बल्कि डूबते सूर्य की भी पूजा होती है। चार दिनों का ये महापर्व छठ पूजा कहलाता है जिसमें हम सूर्य देव और छठी मैया की पूजा करते हैं। पर्व की शुरुआत नहाय खाय से होती है जिसमें अरवा चावल संग लौकी, चने की दाल और अन्य व्यंजन पका कर भोग लगाया जाता है। व्रती अपने परिवार के साथ यह शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन खीर और गुड़ का प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती कठिन व्रत शुरू करते हैं। तीसरे दिन नदी, तालाब या घाट पर डूबते सूर्य को संध्या अर्घ्य और चौथे दिन उगते सूरज को ऊषा अर्घ्य दिया जाता है। इसमें व्रती अपने परिवार के सुख, समृद्धि और संतान की मंगलकामना करते हैं। ठेकुआ और अन्य पारंपरिक प्रसाद ग्रहण कर पर्व का समापन होता है।
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20-21 नवंबर : देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह
देवउठनी एकादशी के शुभ दिन श्री हरि भगवान विष्णु 4 महीनों की योगनिद्रा से जागते हैं और चातुर्मास का समापन होता है। इस दिन से ही शुभ विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यक्रम के लिए मंगलकारी समय शुरू हो जाता है। इस अवसर पर लोग विष्णु पूजन और एकादशी व्रत करते हैं। इसके अगले दिन तुलसी विवाह का शुभ संयोग होता है जिसमें तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराया जाता है। स्थानीय परंपराओं में जिन घरों में कन्या नहीं होती, वे माता तुलसी का कन्यादान करके महापुण्य प्राप्त करते हैं। वहीं विधियों में तुलसी के गमले पर गन्ने का मंडप सजाकर भगवान शालिग्राम की चौकी रखते हैं। माँ तुलसी को चुनरी, अन्य सुहाग की सामग्री जैसे चूड़ी, बिंदी, सिंदूर और शालिग्राम जी को पीला वस्त्र अर्पित करते हैं। अंत में आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है। इस दिन से विवाह के लिए उपयुक्त समय की शुरुआत होती है।
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24 नवंबर : कार्तिक पूर्णिमा
कार्तिक पूर्णिमा हिंदू धर्म में उन चुनिंदा तिथियों में से है जब गंगा स्नान का महत्व और भी बढ़ जाता है। इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इसी शुभ दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नाम के असुर का अंत किया था। सुबह लोग पवित्र नदी में स्नान करके भगवान शिव और विष्णु की पूजा करते हैं, सत्यनारायण की कथा सुनते हैं, वहीं शाम में दीप प्रज्ज्वलित करके घरों, नदियों के घाट और मंदिर को प्रकाशित करते हैं। वाराणसी में इसी शुभ दिन देव दीपावली पर्व का भव्य आयोजन होता है जिसका प्रकाश लोगों को आनंद से भर देता है।
30 नवंबर : कालभैरव जयंती
कालभैरव जयंती भगवान शिव के रौद्र और उग्र अवतार काल भैरव का प्राकट्य दिवस है। यह हर साल मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। भगवान काल भैरव समय और निधन के देवता हैं। इस विशेष दिन इनकी पूजा करने से जीवन में निधन का भय, नकारात्मक ऊर्जा और अन्य बाधाओं का अंत होता है। भक्त उनकी जयंती पर मंदिरों में सरसों के तेल का दीपक, काले तिल, फूल - बेलपत्र अर्पित करते हैं और साथ ही अष्टक का पाठ करते हैं। काशी में इस पर्व का बहुत महत्व है, भगवान काल भैरव को काशी का कोतवाल माना जाता है। वहीं उज्जैन में भी बाबा का प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर स्थित है जहां यह पर्व बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
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दिसंबर 2026
14 दिसंबर : विवाह पंचमी
मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि वह शुभ संयोग है जब त्रेता युग में भगवान राम और माता सीता पवित्र विवाह सूत्र में बंधे थे। भगवान राम ने शिवधनुष को भंग करके माँ सीता का साथ पाया था। यह दिव्य मिलन की स्मृति विवाह और नए पारिवारिक जीवन की शुरुआत के लिए अत्यंत शुभ है। कई मंदिरों में राम सीता विवाह और रामचरितमानस का पाठ संम्पन होता है। इस दिन विवाहित जोड़े, समृद्ध दाम्पत्य जीवन की कामना के लिए भगवान राम को पीले वस्त्र,माला और माता सीता को लाल वस्त्र अर्पित करते हैं। फल, फूल, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर आरती और प्रार्थना करते हैं।
20 दिसंबर : गीता जयंती / मोक्षदा एकादशी
गीता जयंती वह शुभ दिवस है जब भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अपने पार्थ, अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान दिया था। इसी दिन मोक्षदा एकादशी भी होती है जब लोग श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ, सात्विक भोजन ग्रहण और यथाशक्ति दान पुण्य करते हैं। गीता जयंती का पर्व भक्तों में निष्काम कर्म की भावना जगाता है और जीवन के उतार चढ़ाव में अपने संकल्प को और भी मज़बूत करने की शक्ति देता है।
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23 दिसंबर : दत्तात्रेय जयंती
हिंदू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी त्रिमूर्ति का संयुक्त स्वरूप है भगवान दत्तात्रेय। महर्षि अत्रि और माता अनसूया की भक्ति से खुश होकर त्रिदेवों ने उनके पुत्र रूप में जन्म लिया। इनका जन्मोत्सव मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। दत्तात्रेय जयंती हमें प्रकृति और जीवन के अनुभवों से सीख लेने, विनम्र होने और ज्ञान की निरंतर खोज करने की प्रेरणा देती है। इस दिन 'ॐ द्रम दत्तात्रेयाय नमः' या 'ॐ नमो भगवते दत्तात्रेयाय' मंत्र का जाप किया जाता है। भक्त इस दिन इनके बाल स्वरूप का ध्यान, भजन कीर्तन और भंडारे का आयोजन करते हैं।