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नारायण बलि और नाग बलि पूजा पितृ दोष और सर्प-हत्या के प्रायश्चित हेतु त्र्यंबकेश्वर में होती है। जानिए विधि, कौन करे, कब करे और इसका महत्व।

5 अक्टूबर 2026 · 4 मिनट पढ़ें · devpunya team

भारतीय चेतना में देहांत केवल एक जैविक घटना नहीं है। इस कटु सत्य के पार भी कुछ धार्मिक संस्कारों का अस्तित्व बने रहना इसके महत्व को दर्शाता है। भारतीय कर्मकांडों में नारायण बलि और नाग बलि पूजा भी देहांत -संस्कारों से जुड़े दो विशेष अनुष्ठान हैं। जहाँ नारायण बलि का विधान दिवंगत आत्माओं की शांति से जुड़ा है वहीं नाग बलि का संबंध सर्प और नाग देवता से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं से है। ‘अदृश्य के प्रति आस्था’ का भाव इस परंपरा को और भी मज़बूत करता है।

नारायण बलि पूजा क्या है?

नारायण बलि एक ऐसा अनुष्ठान है जो परिवार के उस सदस्य के लिए की जाती है जिसकी अकाल देहांत हुई हो। यदि किसी व्यक्ति की अप्राकृतिक देहांत हुई हो या किसी कारणवश उसका अंतिम संस्कार पूरा नहीं हो पाया हो, ऐसी स्थिति में भी यह अनुष्ठान करने की परंपरा है। पितृ दोष या पितृ शाप को मिटाने के लिए भी नारायण बलि पूजा की जाती है। "नारायण" का अर्थ भगवान विष्णु है। यहाँ "बलि" का अर्थ भेंट या अर्पण है, इसका अर्थ किसी जीव की बलि देना नहीं है।

गरुड़ पुराण में नारायण बलि का उल्लेख

गरुड़ पुराण हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसमें देहांत और उसके बाद की परंपराओं को विस्तार से बताया गया है। नारायण बलि इसी परंपरा का हिस्सा है। इस संस्कार में भगवान नारायण (विष्णु) को साक्षी मानकर धार्मिक विधियाँ संपन्न की जाती हैं। कुछ परंपराओं में गेहूं के आटे से एक प्रतीकात्मक शरीर बनाया जाता है और उसका अंतिम संस्कार किया जाता है। इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु, महेश, यम और मृतक की आत्मा का पूजन, संकल्प और अर्पण किया जाता है। मान्यता है कि इससे आत्मा को शांति मिलती है और वह स्वर्ग में पितरों के बीच अपना स्थान ले पाती है। इसके बाद आमतौर पर दो या तीन दिनों तक श्राद्ध, होम और पिंड दान की प्रक्रिया होती है।

गरुड़ पुराण के चालीसवें अध्याय के सारांश में उन स्थितियों या कारणों का उल्लेख है जिनके लिए यह पूजा की जाती है। इनमें भूख से मौत, जानवर के हमले, दुर्घटना, आग, डूबने, ऊँचाई से गिरने, साँप के काटने, बिजली गिरने, हत्या, आत्महत्या, महामारी और अकाल देहांत शामिल हैं। हालांकि किसी विशेष देहांत के कारण को इस पूजा से जोड़ने से पहले योग्य पुरोहित से संबंधित परंपरा की जानकारी लेना उचित है।

नाग बलि पूजा क्या है?

नागबलि एक प्रायश्चित स्वरूप कर्मकाण्ड है। यह तब की जाती है जब परिवार के किसी सदस्य या पूर्वज के हाथों साँप, विशेष रूप से नाग, की अनजाने में हत्या हो गई हो। कुछ स्थानीय परंपराओं में आमतौर पर तीन दिनों में संपन्न होने वाले नारायण नागबलि अनुष्ठान के दूसरे दिन गेहूँ के आटे से बने नाग की आकृति का अंतिम संस्कार किया जाता है।

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नारायण नागबली पूजा कौन, कब और कैसे कर सकता है?

कौन कर सकता है?

नारायण नागबलि पूजा में पिंडदान के साथ कुछ ज़रूरी कर्मकाण्ड सम्पन्न किए जाते हैं। इनके कर्ता और विधि को लेकर धार्मिक परंपराओं में विभिन्न नियम माने जाते हैं। जिसमें महिलाओं की स्वतंत्र भागीदारी की मान्यता अलग-अलग है जबकि कोई भी पुरुष अकेले या पति-पत्नी (दम्पति) साथ मिलकर संतान प्राप्ति की कामना या वंश वृद्धि के लिए यह अनुष्ठान करा सकते हैं।

पूजा कब करनी चाहिए?

हिंदू पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष (साल 2026 के लिए, 26 सितंबर - ‘पूर्णिमा श्राद्ध’ से शुरू होकर 10 अक्टूबर - ‘सर्वपितृ अमावस्या’ तक) का समय नारायण नागबलि पूजा के लिए सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इसके अलावा हर महीने आने वाली अमावस्या, शुभ नक्षत्र और ख़ास तिथियों पर भी यह अनुष्ठान लाभदायक होता है। पूजा का मुख्य उद्देश्य अकाल देहांत , पितृ दोष, वंश वृद्धि में रुकावट या नाग हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए होता है।

पूजा कहाँ कराई जाती है?

महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित त्र्यंबकेश्वर नारायण बलि और नाग बलि पूजा के लिए सबसे प्रमुख तीर्थस्थल है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर के पास अहिल्या-गोदावरी संगम और सती महाश्मशान के निकट यह अनुष्ठान साल के कई शुभ संयोग और तिथियों पर संपन्न कराया जाता है। धर्मसिंधु और गरुड़ पुराण जैसे ग्रंथों के अनुसार, इस पूजा को करने के लिए त्र्यंबकेश्वर सबसे उत्तम और प्रमाणिक स्थान है। इसके अलावा हरिद्वार स्थित नारायणी शिला मंदिर में भी नारायण नागबली पूजा की जाती है।

नारायण नागबली पूजा का आध्यात्मिक संदेश

हमारी संस्कृति में देहांत को जीवन का अंत नहीं बल्कि आत्मा की अनंत यात्रा का एक पड़ाव माना जाता है। हिंदू दर्शन की माने तो देहांत सिर्फ़ देहांत यानि देह का अंत है, आत्मा का नहीं। नारायण बलि और नाग बलि जैसे अनुष्ठान इसी भावभूमि से जुड़े हैं, जहाँ कर्मकांड के माध्यम से लोग अपनी आस्था, कृतज्ञता और प्रायश्चित्त की भावना को व्यक्त करते हैं।

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